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⁠Kalashtami Fast - Astrologer Deepali Dubey Kalashtami, which is also known as Kala Ashtami, is observed every month during Ashtami Tithi of Krishna Paksha. Devotees of Lord Bhairav keep fast and worship Him on all Kalashtami days in the year. The most significant Kalashtami, which is known as Kalabhairav Jayanti, falls in the month of Margashirsha according to North Indian, Purnima to Purnima, lunar month calendar while Kalabhairav Jayanti falls in the month of Kartik in South Indian, Amavasya to Amavasya, lunar month calendar. However both calendars observe Kalabhairav Jayanti on the same day. It is believed that Lord Shiva was appeared in form of Bhairav on the same day, Added Deepali Astro, Astrologer in Delhi Kalabhairav Jayanti is also known as Bhairav Ashtami. Famous Tarot Card Reader Ms Deepali Dubey says that it should be noted that Kalashtami fasting might be observed on Saptami Tithi. Vratraj Kalashtami fasting should be observed on the day when Ashtami Tithi prevails during night. Ashtami should prevail at least for one Ghati after Pradosh while selecting fasting day for Kalashtami. Otherwise Kalashtami fasting day is moved to previous day when Ashtami Tithi is more likely to prevail during night. Ms Deepali Dubey is renowned Astrologer, Tarot Card Reader And Paranormal Expert in Noida
Best Tarot Card Reader in Delhi 10 simple steps to de-stress - by Ms. Deepali Dubey 1. Manage your time Consider your priorities and delegate or discard unnecessary tasks. 2. Don’t magnify problems Apply logical reason over emotional reactions so you don’t jump to conclusions or distort issues. 3. Ask for help Unsure of your ability to do something? Ask someone supportive who is also knowledgeable. 4. Don’t overextend yourself Consider what is truly essential and important to you versus what can take a backseat right now. 5. Try mini-relaxations Not enough time for stress relief? Slow down just enough to pay attention to one task or pleasure. 6. Loosen up the tension Try massage, a hot bath, mini-relaxations, a body scan, or a mindful walk. Practically, any exercise will help too. 7. Overcome pessimism Remind yourself of the value of optimism and add creative, productive, and leisure pursuits to your life. 8. Manage conflict Own your feelings and be more assertive by stat- ing your needs or distress directly. 9. Self-nurture Care for your mind and body by practicing good health and wellness techniques. 10. Connect with others The world is a kinder, more wondrous place when you share its pleasures and wonders.
Tarot Card Reader In Delhi नवरात्र का चौथा द‌िनः कुम्हड़े की बल‌ि से प्रसन्न होती है मां कूष्मांडा आज शारदीय नवरात्र का चौथा दिन है। इस दिन दुर्गा के नौ रुपों में से चतुर्थ रुप देवी कूष्मांडा की पूजा होती है। देवी कुष्मांडा को देवी भागवत् पुराण में आदिशक्ति के रुप में बताया गया है। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। यहां निवास करने की शक्ति और क्षमता सिर्फ देवी कूष्मांडा में ही है।इनके अंगों की कांति सूर्य के समान ही उज्जवल है। देवी कूष्मांडा के प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। माता की आठ भुजाएं हैं इसलिए यह अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं। माता अपने हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, गदा, चक्र और जपमाला धारण करती हैं। मां कुष्मांडा का वाहन सिंह है।सृष्टि निर्माण के समय माता कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करती हैं इसिलए इनका नाम कूष्मांडा है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ भी कहते हैं। जो भक्त माता को कुम्हड़े की बलि प्रदान करते हैं माता उससे प्रसन्न होती है। देवी पुराण में बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ से पहले अंधकार का साम्राज्य था। उस समय आदि शक्ति जगदम्बा देवी कूष्मांडा के रुप में वनस्पतियों एवं सृष्टि की रचना के लिए जरूरी चीजों को संभालकर सूर्य मण्डल के बीच में विराजमान थी। सृष्टि रचना का जब समय आया तब इन्होंने ही ब्रह्मा विष्णु एवं भगवान शिव की रचना की। इसके बाद सत्, रज और तम गुणों से तीन देवियों को उत्पन्न किया जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली रूप में प्रकट हुई। सृष्टि चलाने में सहायता प्रदान करने के लिए आदि शक्ति ने ब्रह्मा जी को सरस्वती, विष्णु को लक्ष्मी एवं शिव को देवी काली सौंप दिया। आदि शक्ति की कृपा से ही ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता बने, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता। पुराणों में मौजूद कथा के अनुसार तारकासुर के आतंक से जगत को मुक्ति दिलाने के लिए यह जरुरी था कि भगवान शिव के पुत्र का जन्म हो। इसलिए भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया। देवी पार्वती से जब देवों ने तारकासुर से मुक्ति के लिए प्रार्थना की तब माता ने अपने आदिशक्ति रुप को प्रकट किया और यह बताया कि जल्दी ही कुमार कार्तिकेय का जन्म होगा और वह तारकासुर का वध करेगा। मां का आदिशक्ति रुप देखकर देवताओं की शंका और चिंताओं का निदान हुआ। मां इस रुप में भक्तों को यह बताती है कि जो भी भक्त मां कूष्मांडा का ध्यान पूजन करता है उसकी सारी समस्याएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। कूष्मांडा देवी का ध्यान मंत्र वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥ भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
Astrologer in Delhi Tarot Card Reader in Delhi महाविद्याओं में पंचम स्थान पर विद्यमान देवी छिन्नमस्ता, स्व-बलिदान की प्रेरणा स्रोत। स्वयं अपनी या स्वतः बलिदान देने वाली देवी छिन्नमस्ता, दस महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर, बुद्धि और ज्ञान से संबंधित। छिन्नमस्ता शब्दों दो शब्दों के योग से बना हैं: प्रथम छिन्न और द्वितीय मस्ता, इन दोनों शब्दों का अर्थ हैं, 'छिन्न : अलग या पृथक' तथा 'मस्ता : मस्तक', इस प्रकार जिनका मस्तक देह से पृथक हैं वह छिन्नमस्ता कहलाती हैं। देवी अपने मस्तक को अपने ही हाथों से काट कर, अपने हाथों में धारण करती हैं तथा प्रचंड चंडिका जैसे अन्य नामों से भी जानी जाती हैं। उनकी उपस्थिति दस महा-विद्याओं में पाँचवें स्थान पर हैं, देवी एक प्रचंड डरावनी, भयंकर तथा उग्र रूप में विद्यमान हैं। समस्त देवी देवताओं से पृथक देवी छिन्नमस्ता का स्वरूप हैं, देवी स्वयं ही तीनों गुणों; सात्विक, राजसिक तथा तामसिक, का प्रतिनिधित्व करती हैं, त्रिगुणमयी सम्पन्न हैं। देवी ब्रह्माण्ड के परिवर्तन चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, संपूर्ण ब्रह्मांड इस चक्र से चलायमान हैं। सृजन तथा विनाश का संतुलित होना, ब्रह्माण्ड के सुचारु परिचालन हेतु अत्यंत आवश्यक हैं। देवी छिन्नमस्ता की आराधना जैन तथा बौद्ध धर्म में भी की जाती हैं तथा बौद्ध धर्म में देवी छिन्नमुण्डा वज्रवराही के नाम से विख्यात हैं। देवी जीवन के परम सत्य मृत्यु को दर्शाती हैं, वासना से नूतन जीवन के उत्पत्ति तथा अंततः मृत्यु की प्रतीक स्वरूप हैं देवी। देवी, स्व-नियंत्रण के लाभ, अनावश्यक तथा अत्यधिक मनोरथों के परिणाम स्वरूप पतन, योग अभ्यास द्वारा दिव्य शक्ति लाभ, आत्म-नियंत्रण, बढ़ती इच्छाओं पर नियंत्रण का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी, योग शक्ति, इच्छाओं के नियंत्रण और यौन वासना के दमन की विशेषकर प्रतिनिधित्व करती हैं। समस्त प्रकार के अहंकार को छिन्न-छिन्न करती हैं देवी छिन्नमस्ता। संक्षेप में देवी छिन्नमस्ता से सम्बंधित मुख्य तथ्य। मुख्य नाम : छिन्नमस्ता। अन्य नाम : छिन्न-मुंडा, छिन्न-मुंडधरा, आरक्ता, रक्त-नयना, रक्त-पान-परायणा, वज्रवराही। भैरव : क्रोध-भैरव। भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान नृसिंह अवतार। तिथि : वैशाख शुक्ल चतुर्दशी। कुल : काली कुल। दिशा : उत्तर। स्वभाव : उग्र, तामसी गुण सम्पन्न। कार्य : सभी प्रकार के कार्य हेतु दृढ़ निश्चितता, फिर वह अपना मस्तक ही अपने हाथों से क्यों न काटना हो, अहंकार तथा समस्त प्रकार के अवगुणों का छेदन करने हेतु शक्ति प्रदाता, कुण्डलिनी जाग्रति में सहायक। शारीरिक वर्ण : करोड़ों उदित सूर्य के प्रकाश समान कान्तिमयी।
Best Astrologer in Delhi Ncr महाविद्याओं में आठवीं स्थान पर विद्यमान देवी बगलामुखी, सर्व प्रकार स्तंभन युक्त शक्ति। पीताम्बरा नाम से प्रसिद्ध, स्तंभन की पूर्ण शक्ति देवी बगलामुखी। - By Deepali Astro बगलामुखी शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'बगला' तथा दूसरा 'मुखी'। बगला से अभिप्राय हैं 'विरूपण का कारण' (सामान्य रूप से वक या वगुला एक पक्षी हैं, जिसकी क्षमता एक जगह पर अचल खड़े हो शिकार करना है) तथा मुखी से तात्पर्य मुख, मुख स्तम्भन या विपरीत मोड़ने वाली देवी। देवी मुख्यतः स्तम्भन कार्य से सम्बंधित हैं, फिर वह शत्रु रूपी मनुष्य हो, घोर प्राकृतिक आपदा, अग्नि या अन्य किसी भी प्रकार का भय इत्यादि। देवी महाप्रलय जैसे महाविनाश को भी स्तंभित करने की क्षमता रखती हैं, देवी स्तंभन कार्य की अधिष्ठात्री हैं। स्तंभन कार्य के अनुरूप देवी ही ब्रह्म अस्त्र का स्वरूप धारण कर, तीनों लोकों के प्रत्येक विपत्ति का स्तंभित करती हैं। देवी का मुख्य कार्य जिह्वा स्तम्भन से हैं, शत्रु की जिह्वा या वाक् शक्ति या अन्य किसी भी प्रकार की शक्ति के स्तम्भन हेतु देवी की आराधना की जाती हैं। देवी बगलामुखी स्तम्भन की पूर्ण शक्ति हैं, तीनों लोकों के प्रत्येक घोर विपत्ति से लेकर, सामान्य मनुष्य के किसी भी प्रकार विपत्ति स्तम्भन करने की पूर्ण शक्ति हैं। जैसे किसी स्थाई अस्वस्थता, निर्धनता समस्या देवी कृपा से ही स्तंभित होती हैं जिसके परिणामस्वरूप जातक स्वस्थ, धन सम्पन्नता इत्यादि प्राप्त करता हैं। देवी अपने भक्तों के शत्रुओं के पथ तथा बुद्धि भ्रष्ट कर, उन्हें हर प्रकार से स्तंभित कर रक्षा करती हैं, शत्रु अपने कार्य में कभी सफल नहीं हो पाता, शत्रु का पूर्ण रूप से विनाश होता हैं। देवी, पीताम्बरा नाम से त्रि-भुवन में प्रसिद्ध है, पीताम्बरा शब्द भी दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'पीत' तथा दूसरा 'अम्बरा', जिसका अभिप्राय हैं पीले रंग का अम्बर धारण करने वाली। देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिया है, देवी पीले रंग के वस्त्र इत्यादि धारण करती है, पीले फूलों की माला धारण करती है, पीले रंग से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। पञ्च तत्वों द्वारा संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ हैं, जिनमें से पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध पीले रंग से होने के कारण देवी को पिला रंग अत्यंत प्रिय हैं। व्यष्टि रूप में शत्रुओं को नष्ट करने वाली तथा समष्टि रूप में परमात्मा की संहार करने वाली देवी बगलामुखी हैं, इनके भैरव महा मृत्युंजय हैं। देवी की साधना दक्षिणाम्नायात्मक तथा ऊर्ध्वाम्नाय दो पद्धतियों से कि जाती है, उर्ध्वमना स्वरूप में देवी दो भुजाओं से युक्त तथा दक्षिणाम्नायात्मक में चार भुजाये हैं। देवी शक्ति साक्षात ब्रह्म-अस्त्र हैं, जिसका संधान त्रिभुवन में किसी के द्वारा संभव नहीं हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश देवी बगलामुखी में हैं। संक्षेप में देवी बगलामुखी से सम्बंधित मुख्य तथ्य। मुख्य नाम : बगलामुखी। अन्य नाम : पीताम्बरा (सर्वाधिक जनमानस में प्रचलित नाम), श्री वगला। भैरव : मृत्युंजय। भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : कूर्म अवतार। तिथि : वैशाख शुक्ल अष्टमी। कुल : श्री कुल। दिशा : पश्चिम। स्वभाव : सौम्य-उग्र। कार्य : सर्व प्रकार स्तम्भन शक्ति प्राप्ति हेतु, शत्रु-विपत्ति-निर्धनता नाश तथा कचहरी (कोर्ट) में विजय हेतु। शारीरिक वर्ण : पिला। Best Tarot Card Reader in Delhi NCR
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