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2018-04-27T13:22:54
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Best Astrologer in Delhi Ncr महाविद्याओं में आठवीं स्थान पर विद्यमान देवी बगलामुखी, सर्व प्रकार स्तंभन युक्त शक्ति। पीताम्बरा नाम से प्रसिद्ध, स्तंभन की पूर्ण शक्ति देवी बगलामुखी। - By Deepali Astro बगलामुखी शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'बगला' तथा दूसरा 'मुखी'। बगला से अभिप्राय हैं 'विरूपण का कारण' (सामान्य रूप से वक या वगुला एक पक्षी हैं, जिसकी क्षमता एक जगह पर अचल खड़े हो शिकार करना है) तथा मुखी से तात्पर्य मुख, मुख स्तम्भन या विपरीत मोड़ने वाली देवी। देवी मुख्यतः स्तम्भन कार्य से सम्बंधित हैं, फिर वह शत्रु रूपी मनुष्य हो, घोर प्राकृतिक आपदा, अग्नि या अन्य किसी भी प्रकार का भय इत्यादि। देवी महाप्रलय जैसे महाविनाश को भी स्तंभित करने की क्षमता रखती हैं, देवी स्तंभन कार्य की अधिष्ठात्री हैं। स्तंभन कार्य के अनुरूप देवी ही ब्रह्म अस्त्र का स्वरूप धारण कर, तीनों लोकों के प्रत्येक विपत्ति का स्तंभित करती हैं। देवी का मुख्य कार्य जिह्वा स्तम्भन से हैं, शत्रु की जिह्वा या वाक् शक्ति या अन्य किसी भी प्रकार की शक्ति के स्तम्भन हेतु देवी की आराधना की जाती हैं। देवी बगलामुखी स्तम्भन की पूर्ण शक्ति हैं, तीनों लोकों के प्रत्येक घोर विपत्ति से लेकर, सामान्य मनुष्य के किसी भी प्रकार विपत्ति स्तम्भन करने की पूर्ण शक्ति हैं। जैसे किसी स्थाई अस्वस्थता, निर्धनता समस्या देवी कृपा से ही स्तंभित होती हैं जिसके परिणामस्वरूप जातक स्वस्थ, धन सम्पन्नता इत्यादि प्राप्त करता हैं। देवी अपने भक्तों के शत्रुओं के पथ तथा बुद्धि भ्रष्ट कर, उन्हें हर प्रकार से स्तंभित कर रक्षा करती हैं, शत्रु अपने कार्य में कभी सफल नहीं हो पाता, शत्रु का पूर्ण रूप से विनाश होता हैं। देवी, पीताम्बरा नाम से त्रि-भुवन में प्रसिद्ध है, पीताम्बरा शब्द भी दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'पीत' तथा दूसरा 'अम्बरा', जिसका अभिप्राय हैं पीले रंग का अम्बर धारण करने वाली। देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिया है, देवी पीले रंग के वस्त्र इत्यादि धारण करती है, पीले फूलों की माला धारण करती है, पीले रंग से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। पञ्च तत्वों द्वारा संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ हैं, जिनमें से पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध पीले रंग से होने के कारण देवी को पिला रंग अत्यंत प्रिय हैं। व्यष्टि रूप में शत्रुओं को नष्ट करने वाली तथा समष्टि रूप में परमात्मा की संहार करने वाली देवी बगलामुखी हैं, इनके भैरव महा मृत्युंजय हैं। देवी की साधना दक्षिणाम्नायात्मक तथा ऊर्ध्वाम्नाय दो पद्धतियों से कि जाती है, उर्ध्वमना स्वरूप में देवी दो भुजाओं से युक्त तथा दक्षिणाम्नायात्मक में चार भुजाये हैं। देवी शक्ति साक्षात ब्रह्म-अस्त्र हैं, जिसका संधान त्रिभुवन में किसी के द्वारा संभव नहीं हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश देवी बगलामुखी में हैं। संक्षेप में देवी बगलामुखी से सम्बंधित मुख्य तथ्य। मुख्य नाम : बगलामुखी। अन्य नाम : पीताम्बरा (सर्वाधिक जनमानस में प्रचलित नाम), श्री वगला। भैरव : मृत्युंजय। भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : कूर्म अवतार। तिथि : वैशाख शुक्ल अष्टमी। कुल : श्री कुल। दिशा : पश्चिम। स्वभाव : सौम्य-उग्र। कार्य : सर्व प्रकार स्तम्भन शक्ति प्राप्ति हेतु, शत्रु-विपत्ति-निर्धनता नाश तथा कचहरी (कोर्ट) में विजय हेतु। शारीरिक वर्ण : पिला। Best Tarot Card Reader in Delhi NCR
2018-04-26T02:27:35
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Best Astrologer in Delhi NCR मोहिनी एकादशी 2018 : एकादशी पूजा विधी और व्रत कथा मोहिनी एकादशी व्रत मोह-माया के बंधनों से मुक्त करता है। मोहिनी एकादशी व्रत प्रत्येक वर्ष वैशाख शुक्ल की एकादशी तिथी को मनाया जाता है। इस साल मोहिनी एकादशी व्रत 26 अप्रैल 2018 गुरुवार के दिन है। यह व्रत करने से पाप से मुक्ति दिलाता है जो व्यक्ति इस व्रत को करता है वह सारे मोह-माया से मुक्त हो जाता है, तथा वह मोक्ष को प्राप्त करता है। मोहिनी एकादशी का महत्व स्कंद पुराण के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ था तब अमृत कलश पाने के लिए दानवों और देवताओं के मध्य जब विवाद हो गया तब दानवों को मोहित करने के लिए भगवान विष्णु ने सुंदर स्त्री का रुप धारण किया और दानवों को मोहित कर श्री विष्णु ने अमृत कलश लेकर देवताओं को सारा अमृत पीला दिया था और सभी देवता अमृत पीकर अमर हो गये। और कहा जाता है कि जिस दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था उस दिन वैशाख शुक्ल एकादशी तिथि थी इसी कारण भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा मोहिनी एकादशी के रूप में की जाती है। यही जो भक्त यह व्रत करता है वह अपनी सभी परेशानियों को मोहिनी रूप धारण कर समाधान करने का सामर्थ्य रखेगा। जानें एकादशी व्रत व पूजन विधि व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठें नित्य कर्म कर शुद्ध जल से स्नान करें। कुश और तिल के लेप का प्रयोग कर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लें और देवों का पूजन करने के लिए कलश की स्थापना कर लें, कलश के ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कलश का पूजन करें। कलश का पूजन करने के पश्चात उसके उपर भगवान की तस्वीर या प्रतिमा रखें, इसके बाद भगवान की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध कर उत्तम वस्त्र पहनाना चाहिए। धूप, दीप से आरती उतारने के बाद फल, मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद प्रसाद वितरित कर ब्राह्मणों को भोजन तथा दान-दक्षिणा दें। रात्रि में भगवान का कीर्तन करते हुए मूर्ति के पास ही सोना चाहिए। एकादशी व्रत कथा सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम का एक नगर था। जहां पर एक धनपाल नाम का वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से परिपूर्ण था। वह सदा पुण्य कर्म में ही लगा रहता था। उसके पांच पुत्र थे। इनमें सबसे छोटा धृष्टबुद्धि था। वह पाप कर्मों में अपने पिता का धन लुटाता रहता था। एक दिन वह नगर वधू के गले में बांह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया। इससे नाराज होकर पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बंधु-बांधवों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। वह दिन-रात दुख और शोक में डूब कर इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन वह किसी पुण्य के प्रभाव से महर्षि कौण्डिल्य के आश्रम पर जा पहुंचा। वैशाख का महीना था। कौण्डिल्य गंगा में स्नान करके आए थे। धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिल्य के पास गया और हाथ जोड़कर बोला, ब्राह्मण ! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया कीजिए और कोई ऐसा व्रत बताइए जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो जाए।तब ऋषि कौण्डिल्य ने बताया कि वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मोहिनी नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से कई जन्मों के पाप भी नष्ट हो जाते हैं। धृष्टबुद्धि ने ऋषि की बताई विधि के अनुसार व्रत किया। जिससे वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर श्री विष्णुधाम को चला गया।
2018-04-21T04:01:54
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Best Tarot Card Reader in Delhi 10 simple steps to de-stress - by Ms. Deepali Dubey 1. Manage your time Consider your priorities and delegate or discard unnecessary tasks. 2. Don’t magnify problems Apply logical reason over emotional reactions so you don’t jump to conclusions or distort issues. 3. Ask for help Unsure of your ability to do something? Ask someone supportive who is also knowledgeable. 4. Don’t overextend yourself Consider what is truly essential and important to you versus what can take a backseat right now. 5. Try mini-relaxations Not enough time for stress relief? Slow down just enough to pay attention to one task or pleasure. 6. Loosen up the tension Try massage, a hot bath, mini-relaxations, a body scan, or a mindful walk. Practically, any exercise will help too. 7. Overcome pessimism Remind yourself of the value of optimism and add creative, productive, and leisure pursuits to your life. 8. Manage conflict Own your feelings and be more assertive by stat- ing your needs or distress directly. 9. Self-nurture Care for your mind and body by practicing good health and wellness techniques. 10. Connect with others The world is a kinder, more wondrous place when you share its pleasures and wonders.
2018-04-15T03:30:53
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Best Astrologer in Delhi NCR रुद्राक्ष पहनने के फ़ायदे हिंदू धर्म में रुद्राक्ष को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष पहनना बहुत शुभ होता है, पर क्या आपको पता है कि रुद्राक्ष पहनने से हमारी सेहत को भी बहुत सारे लाभ हो सकते हैं. अगर आप रुद्राक्ष पहनते हैं तो इससे आपको आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि कई सारे मानसिक और सेहत से भरपूर फायदे मिल सकते हैं. रुद्राक्ष पहनने से दिल से लेकर शुगर तक की समस्याओं में फायदा मिलता है. आज हम आपको रुद्राक्ष पहनने के कुछ फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं. 1- रुद्राक्ष में भरपूर मात्रा में के मुंह फार्माकोलॉजीकल गुण मौजूद होते हैं, जो ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल में रखने का काम करते हैं. इसे पहनने से आप दिल से जुड़ी बीमारियों से बचे रहते हैं. 2- रुद्राक्ष में भरपूर मात्रा में आयरन, फास्फोरस, एल्युमीनियम, कैल्शियम, सोडियम, पोटेशियम और सिलिका के गुण मौजूद होते हैं. जो आपके नर्वस सिस्टम को प्रभावित करने का काम करते हैं. इसे पहनने से आपका नर्वस सिस्टम ठीक से काम करता है. 3- अगर आप हमेशा रुद्राक्ष पहन कर रखते हैं, तो इससे आप डायबिटीज और किडनी से जुड़ी बीमारियों से बचे रह सकते हैं. रुद्राक्ष पहनने से आंखें, दिल, और दिमाग स्वस्थ रहते हैं. इसे पहनने से चिंता, तनाव, अवसाद जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं. 4- अगर आप पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करते हैं, तो इससे आपका ब्लड प्रेशर हमेशा कंट्रोल में रहता है. इसके अलावा रुद्राक्ष धारण करने से तनाव या डिप्रेशन की समस्या भी दूर हो जाती है.
2018-04-11T12:06:41
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Astrologer in Delhi Tarot Card Reader in Delhi महाविद्याओं में पंचम स्थान पर विद्यमान देवी छिन्नमस्ता, स्व-बलिदान की प्रेरणा स्रोत। स्वयं अपनी या स्वतः बलिदान देने वाली देवी छिन्नमस्ता, दस महाविद्याओं में पांचवें स्थान पर, बुद्धि और ज्ञान से संबंधित। छिन्नमस्ता शब्दों दो शब्दों के योग से बना हैं: प्रथम छिन्न और द्वितीय मस्ता, इन दोनों शब्दों का अर्थ हैं, 'छिन्न : अलग या पृथक' तथा 'मस्ता : मस्तक', इस प्रकार जिनका मस्तक देह से पृथक हैं वह छिन्नमस्ता कहलाती हैं। देवी अपने मस्तक को अपने ही हाथों से काट कर, अपने हाथों में धारण करती हैं तथा प्रचंड चंडिका जैसे अन्य नामों से भी जानी जाती हैं। उनकी उपस्थिति दस महा-विद्याओं में पाँचवें स्थान पर हैं, देवी एक प्रचंड डरावनी, भयंकर तथा उग्र रूप में विद्यमान हैं। समस्त देवी देवताओं से पृथक देवी छिन्नमस्ता का स्वरूप हैं, देवी स्वयं ही तीनों गुणों; सात्विक, राजसिक तथा तामसिक, का प्रतिनिधित्व करती हैं, त्रिगुणमयी सम्पन्न हैं। देवी ब्रह्माण्ड के परिवर्तन चक्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, संपूर्ण ब्रह्मांड इस चक्र से चलायमान हैं। सृजन तथा विनाश का संतुलित होना, ब्रह्माण्ड के सुचारु परिचालन हेतु अत्यंत आवश्यक हैं। देवी छिन्नमस्ता की आराधना जैन तथा बौद्ध धर्म में भी की जाती हैं तथा बौद्ध धर्म में देवी छिन्नमुण्डा वज्रवराही के नाम से विख्यात हैं। देवी जीवन के परम सत्य मृत्यु को दर्शाती हैं, वासना से नूतन जीवन के उत्पत्ति तथा अंततः मृत्यु की प्रतीक स्वरूप हैं देवी। देवी, स्व-नियंत्रण के लाभ, अनावश्यक तथा अत्यधिक मनोरथों के परिणाम स्वरूप पतन, योग अभ्यास द्वारा दिव्य शक्ति लाभ, आत्म-नियंत्रण, बढ़ती इच्छाओं पर नियंत्रण का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी, योग शक्ति, इच्छाओं के नियंत्रण और यौन वासना के दमन की विशेषकर प्रतिनिधित्व करती हैं। समस्त प्रकार के अहंकार को छिन्न-छिन्न करती हैं देवी छिन्नमस्ता। संक्षेप में देवी छिन्नमस्ता से सम्बंधित मुख्य तथ्य। मुख्य नाम : छिन्नमस्ता। अन्य नाम : छिन्न-मुंडा, छिन्न-मुंडधरा, आरक्ता, रक्त-नयना, रक्त-पान-परायणा, वज्रवराही। भैरव : क्रोध-भैरव। भगवान विष्णु के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान नृसिंह अवतार। तिथि : वैशाख शुक्ल चतुर्दशी। कुल : काली कुल। दिशा : उत्तर। स्वभाव : उग्र, तामसी गुण सम्पन्न। कार्य : सभी प्रकार के कार्य हेतु दृढ़ निश्चितता, फिर वह अपना मस्तक ही अपने हाथों से क्यों न काटना हो, अहंकार तथा समस्त प्रकार के अवगुणों का छेदन करने हेतु शक्ति प्रदाता, कुण्डलिनी जाग्रति में सहायक। शारीरिक वर्ण : करोड़ों उदित सूर्य के प्रकाश समान कान्तिमयी।
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